Skip to main content

Shopping Cart

You're getting the VIP treatment!

Item(s) unavailable for purchase
Please review your cart. You can remove the unavailable item(s) now or we'll automatically remove it at Checkout.
itemsitem
itemsitem

Recommended For You

Loading...
  • Varchasva

    नब्बे के ही दशक में जब राजनेताओं के दिन-दहाड़े सरेआम मर्डर होने लगे तो ज़ाहिर है कि नेताओं के मन में ख़ौफ़ बैठ जाना ही था और नई पीढ़ी के वह लोग, जो देश के लिए राजनीति के सहारे कुछ करने की वाक़ई चाह रखते थे, उन्होंने इस राह पर चलने के अपने इरादों पर लगाम लगा दी। राजनीति को अपराधियों, हत्यारों, डकैतों और बलात्कारियों के हाथों में जाने देने का यह यथार्थ बड़ा भयावह था।बस, यही वह समय था जब बड़े-बड़े ख़ूँख़ ... Read more

    $4.14 USD or Free with Kobo Plus

  • Kavita Mein Banaras

    ग़ालिब उसे हिन्दुस्तान का क़ाबा कहते हैं, तो कबीर कहते हैं, ‘चोवा चंदन अगर पान, घर घर सुमृति होत पुरान’, तुलसी के लिए वह ‘परमारथ की खान’ है। भारतेन्दु के लिए वहाँ के ‘लोग निकम्मे भंगी गंजड़, लुच्चे बे-बिसवासी’ हैं तो बेढब बनारसी कहते हैं कि बनारस की कोई शान ही नहीं रह जाएगी जिस दिन गलियों में पान की दुकानें नहीं दिखेंगी। श्रीकान्त वर्मा की काशी में ‘जिस रास्ते जाते हैं शिव, उसी रास्ते आता है शव’, तो ... Read more

    $3.10 USD or Free with Kobo Plus

  • Main Ambedkar Bol Raha Hoon

    “जो कुछ मैं कर सका, वह जीवन भर मुसीबतें सहन करके विरोधियों से टक्कर लेने के बाद कर पाया हूँ। जिस कारवाँ को आप यहाँ देख रहे हैं, उसे मैं अनेक कठिनाइयों से यहाँ ला पाया हूँ। अनेक अवरोधों, जो इसके मार्ग में आ सकते हैं, के बावजूद इस कारवाँ को बढ़ते रहना है। अगर मेरे अनुयायी इसे आगे ले जाने में असमर्थ रहे तो उन्हें इसे यहीं पर छोड़ देना चाहिए, जहाँ पर यह अब है; पर किन्हीं भी परिस्थितियों में इसे पीछे ... Read more

    $3.30 USD or Free with Kobo Plus

  • Jatiyon Ka Loktantra : Jati Aur Aarakshan

    भारत के सामाजिक पदानुक्रम को आरक्षण ने काफी बदला है, लेकिन उतना शायद नहीं जितने की अपेक्षा थी, और जिसको ध्यान में रखकर हमारे संविधान-निर्माताओं ने सामाजिक न्याय को एक आधारभूत मूल्या माना था।आज भी समाज का एक बड़ा हिस्सा सबसे कमजोर भारतवासियों को मिले आरक्षण को वैरभाव से देखता है, आज भी ऊँचे सरकारी पदों पर दलित-आदिवासी बहुत कम हैं और चतुर्थ श्रेणी या सफाई जैसे कामों में उनकी संख्या ज्यादा दिखाई देती ... Read more

    $3.63 USD or Free with Kobo Plus

  • Kahaniyan Rishton Ki : Dada-Dadi, Nana-Nani

    दादा-दादी, नाना-नानी बच्चों के लिए एक गहरी शीतल छाँह की तरह होते हैं। ये रिश्ते केवल पीढ़ियों का संवाद नहीं, भावनात्मक मूल्यों का विस्तार हैं। इन रिश्तों की कहानियाँ ऐसे समाज में सम्भव नहीं जहाँ बूढ़ा-बूढ़ी ओल्ड एज होम में मृत्यु का इन्तज़ार करते हों; और कामकाजी पति-पत्नी के बच्चों का अधिकांश समय चाइल्ड केयर सेंटर में गुज़रता हो। आज जब एकल परिवार की भी सीमाएँ उजागर हो चुकी हैं, तब इन रिश्तों के मर ... Read more

    $1.56 USD or Free with Kobo Plus

  • Kahaniyan Rishton Ki : Bade Bujurg

    बड़े-बुज़़ुर्ग कहते ही कुछ ऐसा लगता है जैसे जीवन की मुख्यधारा से चुपचाप किनारे होता कोई व्यक्ति। लेकिन उम्र का चढ़ते जाना जीवन के अन्त की कातर प्रतीक्षा में बदलना नहीं है। व्यक्ति की लालसाएँ और प्रतीक्षाएँ तो नित नई हमेशा रहती हैं। बुज़ुर्गों को अक्सर अपने पुराने दिनों से भी एक लड़ाई लड़नी पड़ती है। अपनी आदतों से, दूसरों की अपेक्षाओं से और सबसे ज़्यादा अपनी कमज़ोर पड़ती सामर्थ्य और हैसियत से। लेकिन यह ज ... Read more

    $1.56 USD or Free with Kobo Plus

  • Sagar Yaraa

    सागर यारा की कहानियाँ हमें बीसवीं सदी के उस दौर में ले जाती हैं जब रूमान की हैसियत एक समाजी ताक़त की होती थी। ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से वह बराबर की टक्कर लेता था। किताबें पढ़ना, सपने देखना, ख़ुद के दायरे से निकलकर पूरी दुनिया के भविष्य के बारे में सोचना, पैसे की क़ुदरत को चुनौती देना और ज़िन्दगी के इस तरीक़े पर सवाल उठानेवाली रुकावटों से जान पर खेलकर लड़ना उस दौर के रौशन दिमाग़ों की अपनी जीवन-शैली ... Read more

    $3.10 USD or Free with Kobo Plus

  • Kahaniyan Rishton Ki : Gaon-Ghar

    हिन्दी में गाँव-घर या जड़ों से लगाव की बहुत सारी कहानियाँ लिखी गई हैं और अभी भी लिखी जा रही हैं; क्योंकि जड़ों से लगाव ही तो देता है जीवन और स्थायित्व। आज जब आभासी यथार्थ ने व्यक्ति को सचमुच के यथार्थ से दूर और जड़ों से अलग कर दिया है, ऐसे समय में इस संचयन की ज़रूरत और ज़िम्मेदारी बढ़ जाती है। हिन्दी कहानी की लोकधर्मी परम्परा का ध्यान रखते हुए चुनी हुई इन कहानियों को पढ़कर हम अपने अतीत की आत्म-मुग्धता ... Read more

    $1.56 USD or Free with Kobo Plus

  • Kahaniyan Rishton Ki : Dost

    भारतीय समाज में रिश्तों को जितनी मजबूती, आत्मीयता और उर्जा हासिल रही हैं, वह विरल है । एक तरह से कहा जा सकता है कि इस देश के यथार्थ को रिश्तों की समझ के बगैर जाना-समझा नहीं जा सकता है । माँ-पिता, भाई-बहन, दोस्त, दादी-नानी, बाबा-नाना, मामा, मौसा-मौसी, बुआ-फूफा, दादा, चाचा, दोस्ती अनगिनत समबन्ध हैं जो लोगों के अनुभव-संसार में जिवंत हैं और जिनसे लोगों का अनुभव-संसार बना है । इसलिए हमारे देश की विभिन ... Read more

    $1.56 USD or Free with Kobo Plus

  • Kahaniyan Rishton Ki : Pita

    इनसान के जीवन में जितने सम्बन्ध होते हैं उनमें पिता जैसा विविधरूपी, बहुआयामी और बहुस्तरीय रिश्ता कोई दूसरा नहीं होता है। दूरी और नज़दीकी के जाने कितने शेड्स इस एक रिश्ते में होते हैं। इस संकलन में उन सभी बेहतरीन कहानियों का चयन करने की कोशिश की गई है, जिनसे पिता का सम्बन्ध अपने विविध रूपों में सामने आ सके। इस संकलन की कहानियों को पढ़ते हुए भिन्न-भिन्न दौर के पिता की झलक भी साकार होती है। ... Read more

    $1.56 USD or Free with Kobo Plus

  • Rachna Se Samvad

    by Malayaj, Ed. Tarun ...
    मलयज की आलोचना की सबसे महत्त्वपूर्ण क्षमता है निर्णय लेना, निष्कर्ष तक पहुँचना और निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए पाठ के साथ रचना-प्रक्रिया और लेखक की अनुभूति को समझना। रचना की समीक्षा करते समय उनके लिए सिर्फ रचना ही खास नहीं बल्कि रचनाकार की अनुभूति भी खास है जिसका अध्ययन वे रचना के समानान्तर करते हैं और तत्पश्चात अपने निष्कर्ष देते हैं। रचनाकार की अनुभूति के अध्ययन करने की प्रक्रिया रचना के पाठ के सम ... Read more

    $7.49 USD or Free with Kobo Plus

  • Kahaniyan Rishton Ki : Parivar

    भारतीय जीवन में परिवार का वही है, जो किसी भी धर्म या सम्प्रदाय में पूजागृह का होता है। परिवार नामक संस्था ही भारतीय जीवन और समाज-व्यवस्था का मूल है। पिछले सौ सालों में चौतरफ़ा बदलाव के बीच भारतीय समाज में परिवार की संरचना, उसमें अन्तर्निहित तरलता और सम्बन्धों की तीव्रता में क्या और कैसे बदलाव आए हैं, इस संकलन की कहानियों में साफ़-साफ़ दीखता है। संयुक्त परिवार से एकल परिवार और फिर लिव-इन रिलेशनशिप ... Read more

    $1.56 USD or Free with Kobo Plus