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  • Jenny Meharban Singh

    de Krishna Sobti ...
    भारतीय मूल के प्रवासी मेहरबान सिंह और उनकी पत्नी लिज़ा की इकलौती सन्तान सुनहरी बालों वाली जैनी पूर्व और पश्चिम, देश और विदेश के दोरंगी सम्मिश्रण की अनोखी तस्वीर है। चुलबुली मनमौजी, समझदार और गम्भीर एक साथ।‘जैनी मेहरबान सिंह’ ज़िन्दगी के रोमांस, उत्साह, उमंग और उजास की पटकथा है जिसे कृष्णा सोबती ने गुनगुनी सादगी से प्रस्तुत किया है।वैन्कूवर से दूर पिछवाड़े से झाँकते हैं एक-दूसरे के वैरी दो गाँव पट्टीव ... Leer más

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  • Samaya Sargam

    de Krishna Sobti ...
    हम हैं तो समय है।हमारी ही चेतना में संचित है हमारा काल-आयाम। हम हैं, क्योंकि धरती है, हवा है, धूप है, जल है और यह आकाश। इसीलिए हम जीवित हैं।भीतर और बाहर—सब कहीं—सब कुछ को अपने में सँजोए। विलीन हो जाने को पल-पल अनन्त में...।पुरानी और नई सदी के दो-दो छोरों को समेटता ‘समय सरगम’ जिए हुए अनुभव की तटस्थता और सामाजिक परिवर्तन से उभरा, उपजा एक अनूठा उपन्यास है; और फिर भारत की बुज़ुर्ग पीढ़ियों का एक ही साथ ... Leer más

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  • Marfat Dilli

    de Krishna Sobti ...
    दिल्ली से कृष्णा सोबती का रिश्ता बचपन से है। आज़ादी से पूर्व उनका वेतनभोगी परिवार साल के छह माह शिमला और छह माह दिल्ली में निवास करता था। अपने किशोर दिनों में वे दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हॉकी खेलती रही हैं। बँटवारे के बाद लाहौर से आकर वे स्थायी तौर पर दिल्ली की हो गईं। दिल्ली का नागरिक होने पर उन्हें गर्व भी है और इस शहर से प्रेम भी। यहाँ के इतिहास और भूगोल को वे बहुत गहरे से जानती रही हैं। ... Leer más

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  • Tin Pahar

    de Krishna Sobti ...
    ‘साँझ की उदास-उदास बाँहें अँधिआरे से आ लिपटीं। मोहभरी अलसाई आँखें झुक-झुक आईं और हरियाली के बिखरे आँचल में पत्थरों के पहाड़ उभर आए। चौंककर तपन ने बाहर झाँका। परछाई का सा सूना स्टेशन, दूर जातीं रेल की पटरियाँ और सिर डाले पेड़ों के उदास साए। पीली पाटी पर काले अक्खर चमके ‘तिन-पहाड़,’ और झटका खा गाड़ी प्लेटफॉर्म पर आ रुकी।’ इन्हीं वाक्यों के साथ नियति की यह कथा खुलती है। जया, तपन, श्री, एडना जिसके अलग ... Leer más

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  • Wah Samay Yah Samay

    de Krishna Sobti ...
    ‘वह समय’—कृष्णा जी ने इस टुकड़े को यही नाम दिया था, जिसे ‘ज़िन्दगीनामा’ के दूसरे भाग का हिस्सा होना था। सम्बन्धों के सामाजिक तर्कों और नैतिक आग्रहों के ऊपर चलती दिलों की यह कहानी शाह जी और राबयाँ की है। शाह जी अपने आधे को पार कर चुके हैं और राबयाँ जवानी की सीढ़ियाँ चढ़ रही है—तुकें मिलाती है, कवित्त लिखती है, शाह जी उसके लिखे को दुरुस्त करते हैं, उसे पढ़ाते-सिखाते हैं। इसी में उम्र, मज़हब और परिव ... Leer más

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  • Lekhak Ka Jantantra

    de Krishna Sobti ...
    कृष्णा सोबती के लिए लेखक की पहचान एक साधारण नागरिक का बस थोड़ा-सा विशेष हो जाना है। समाज की मंथर लेकिन गहरी और शक्तिशाली धारा में अपनी क़ीमत पर पैर जमाकर खड़ा हुआ एक व्यक्ति जो जीवन को जीते हुए उसे देखने की कोशिश भी करता है। उनके अनुसार लेखक का काम अपनी अन्तरभाषा को चीन्हते और सँवारते हुए अज्ञात दूरियों को निकटताओं में ध्वनित करना है।लेखक की इस पहचान को स्वयं उन्होंने जिस अकुंठ निष्ठा और मौन संकल ... Leer más

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  • Daar Se Bichhudi

    de Krishna Sobti ...
    पाशो अभी किशोरी ही थी, जब उसकी माँ विधवा होकर भी शेखों की हवेली जा चढ़ी। ऐसे में माँ ही उसके मामुओं के लिए 'कुलबोरनी' नहीं हो गई, वह भी सन्देहास्पद हो उठी। नानी ने भी एक दिन कहा ही था—‘सँभलकर री, एक बार का थिरका पाँव जिन्दगानी धूल में मिला देगा!’’लेकिन थिरकने-जैसा तो पाशो की ज़िन्दगी में कुछ था ही नहीं, सिवा इसके कि वह माँ की एक झलक देखने को छटपटाती और इसी के चलते शेखों की हवेलियों की ओर निकल जाती। ... Leer más

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  • Hum Hushmat : Vol. 4

    de Krishna Sobti ...
    ‘हम हशमत’ का यह चौथा भाग है। कृष्णा सोबती ने ‘हशमत’ को सिर्फ़ एक उपनाम की तरह ग्रहण नहीं किया था, बल्कि वह अपने आप में एक सम्पूर्ण व्यक्तित्व है। कृष्णा जी ने स्वयं कहा है कि जब वे ‘हशमत’ के रूप में लिखती हैं, तो न सिर्फ़ उनकी भाषा, और शब्द-चयन कुछ अलग हो जाते हैं, उनका हस्तलेख तक कुछ और हो जाता है। ‘हशमत’ का विषय उनके समकालीनों, साथी लेखकों के अलावा गोष्ठियों, पार्टियों में हुए अनुभव और समसामयिक ... Leer más

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  • Rachna Ka Garbhgriha

    कृष्णा सोबती का हर क्षण सामान्यत: लेखक का ही क्षण होता था; लेखक होने को उन्होंने जीने की एक शैली के रूप में विकसित किया। लेकिन रचना के आत्यंतिक क्षण की अनायासता और उसके रहस्य को उन्होंने कभी भंग नहीं होने दिया। उस अनुभव की सम्पूर्णता उनके लिए एक बड़ी चीज़ थी। उस कौंध की आभा को जिससे रचना की पहली पंक्ति फूटती है, उन्होंने किसी ऐहिक उतावलेपन का शिकार नहीं होने दिया।इसीलिए उनकी हर कृति एक घटना की तरह ... Leer más

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  • Yaron Ke Yaar

    de Krishna Sobti ...
    राजधानी का एक सरकारी दफ़्तर, उसकी आबो-हवा और वहाँ काम करनेवाले लोगों की रग-रग का हाल। वास्तविकता के एक-एक शेड को कम-से-कम शब्दों में पकड़कर सँजो देने में माहिर कृष्णा जी की भाषा इस कृति में भी अपने रचनात्मक शिखर पर है।उनकी तमाम कृतियों की तरह यह उपन्यास भी उनकी इस धारणा की पैरवी करता है कि ‘किसी भी व्यक्ति के लिए, जिसकी मूल और आन्तरिक प्रेरणा सत्य है, केवल साहित्य ही एक ऐसा कवच है, जिसके भीतर वह ... Leer más

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  • Mitro Marjani

    de Krishna Sobti ...
    रघुवीर सहाय की पंक्ति है—जिसका भाव है कि इस दुनिया के सिर पर अँधेरे में अगर मैं एक डंडा मारूँ तो यह किस भाषा में चीखेगी? मित्रो इस कहानी में संयुक्त परिवार की भीरु आत्मतुष्ट दुनिया के सिर पर पड़नेवाले डंडे की चोट है।चरित्र की दृष्टि से मित्रो हिन्दी कहानी की अभूतपूर्व पात्र है। इस गृहस्थी में पता नहीं कहाँ से टपक पड़ी है, उसने सब कुछ अस्त-व्यस्त कर दिया है। ऐसा सजीव, सदेह पात्र किसी परिवार को तोड़ ... Leer más

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  • Aai Larki

    de Krishna Sobti ...
    यह एक लम्बी कहानी है—यों तो मृत्यु की प्रतीक्षा में एक बूढ़ी स्त्री की, पर वह फैली हुई है उसकी समूची ज़िन्दगी के आर-पार, जिसे मरने के पहले अपनी अचूक जिजीविषा से वह याद करती है। उसमें घटनाएँ, बिम्ब, तस्वीरें और यादें अपने सारे ताप के साथ पुनरवतरित होते चलते हैं—नज़दीक आती मृत्यु का उसमें कोई भय नहीं है बल्कि मानो फिर से घिरती-घुमड़ती सारी ज़िन्दगी एक निर्भय न्योता है कि वह आए, उसके लिए पूरी तैयारी है। ... Leer más

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