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  • Daste-Saba

    दस्ते-सबा’ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का दूसरा कविता-संग्रह है, जिसका न सिर्फ़ उनके साहित्य में, बल्कि समूचे प्रगतिशील साहित्य में ऐतिहासिक महत्त्व है। यह जब नवम्बर 1952 में प्रकाशित हुआ था, तब फ़ैज़ रावलपिंडी ‘साज़िश’ मुक़दमे के तहत हैदराबाद सेंट्रल जेल (पाकिस्तान) में बन्द थे।कॉलेज के दिनों में रोमान से भरपूर फ़ैज़ ने देश-दुनिया की जिन सच्चाइयों का सामना करते हुए ‘ग़मे-जानाँ’ और ‘ग़मे-दौराँ’ को एक ही तजुर ... Leer más

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  • Zindan-Nama

    मुहब्बत और इनक़लाब की तरफ़दारी फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शाइरी का बुनियादी स्वर है और रोमान इस शाइरी के तेवर का ख़ास पहलू। प्रगतिशील मूल्यों की तरफ़दारी करनेवाली इस शाइरी के असर का अन्दाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि फ़ैज़ के जीते-जी यह उनके मुल्क और भाषा की सरहदों को पार कर दुनिया-भर के शोषित-पीड़ित अवाम की आवाज़ बन गई। और यह सिलसिला आज भी जारी है। ‘ज़िन्दाँनामा’ का इस सन्दर्भ में विशेष महत्त्व है।यह फ़ ... Leer más

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  • Naqsh-E-Fariyadi

    ‘नक़्श-ए-फ़रियादी’ फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का पहला कविता-संग्रह है जो पहली बार 1941 में प्रकाशित हुआ था। मुहब्बत और इन्क़लाब का जो अटूट अपनापा आगे चलकर फ़ैज़ की समूची शायरी की पहचान बना, उसकी बुनियाद इस संग्रह में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसमें बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशक की उनकी तहरीरें शामिल हैं, जब फ़ैज़ युवा थे और उनका दिलो-दिमाग़ एक तरफ़ ‘ग़मे-जानाँ’ से तो दूसरी तरफ़ ‘ग़मे-दौराँ’ से एक साथ वाबस ... Leer más

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